Tuesday, February 15, 2011
Sunday, March 7, 2010
Tuesday, March 2, 2010
Friday, February 26, 2010
महंत साहेब
Saturday, February 20, 2010
आँख है फिर भी अंधे न बने | पढ़े हो तो अनपढ़ न बनो

कबीर साहेब ने जो भी कहा था वह हमेशा सच ही कहा था | आज सभी उनकी बोली का प्रयोग कर रहे हैं | कबीर ने समाज की बुराइयों को दूर करने का बहुत प्रयास किया | आज भी हमारे समाज में बहुत सी बुराइयां हैं | आज भी हम अंधविश्वासों को छोड़ नहीं पा रहे हैं | आज विज्ञानं का युग है फिर भी हम उन पुरानी परम्पराओं को मानते हैं | अब हमें हर बात को आंख बंद करके नहीं मन लेना चाहिए | आज भी हमारे देश में ईश्वर के प्रति अंधभक्ति है | ईश्वर के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए, लेकिन उस बात पर विचार भी करना चाहिए कि बात सच है या नहीं | यदि बात सच है तो अवश्य मानना चाहिए | आज इसीलिए धर्म के नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है |
कबीर साहेब ने मानव सेवा पर जोर दिया कि हमें सभी दीन दुखियों की सेवा करनी चाहिए | सबसे पहले तो परिवार के लोगों की सेवा करनी चाहिए और उसके बाद अन्य सभी की |
" मानव सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है "
हमारे समाज में एक बुराई त्रयोदशी संस्कार या मृत्यु भोज , इसका एक नाम और भी है वह है तेरहवीं | यह प्रथा ठीक नहीं है जब इसे समाज के नाम पर आवश्यक माना जाता है , चाहे उसकी स्थिति इस संस्कार को करने लायक न हो |ऐसी स्थिति में तो यह प्रथा बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है | इस के लिए कुछ सामाजिक संगठन तो बहुत प्रयास कर रहे हैं फिर भी यह प्रथा अभी भी चल रही है | आज हम २१वी सदी है लेकिन इस प्रथा को चला रहे है | यह सभी धर्मों में है वहां इसके नाम दूसरे हो सकते है लेकिन यह प्रथा ठीक नहीं है | जो गरीब है या अशिक्षित है उनसे इस प्रथा को जबरदस्ती न कराया जाये |
कबीर साहेब ने मानव सेवा पर जोर दिया कि हमें सभी दीन दुखियों की सेवा करनी चाहिए | सबसे पहले तो परिवार के लोगों की सेवा करनी चाहिए और उसके बाद अन्य सभी की |
" मानव सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है "
हमारे समाज में एक बुराई त्रयोदशी संस्कार या मृत्यु भोज , इसका एक नाम और भी है वह है तेरहवीं | यह प्रथा ठीक नहीं है जब इसे समाज के नाम पर आवश्यक माना जाता है , चाहे उसकी स्थिति इस संस्कार को करने लायक न हो |ऐसी स्थिति में तो यह प्रथा बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है | इस के लिए कुछ सामाजिक संगठन तो बहुत प्रयास कर रहे हैं फिर भी यह प्रथा अभी भी चल रही है | आज हम २१वी सदी है लेकिन इस प्रथा को चला रहे है | यह सभी धर्मों में है वहां इसके नाम दूसरे हो सकते है लेकिन यह प्रथा ठीक नहीं है | जो गरीब है या अशिक्षित है उनसे इस प्रथा को जबरदस्ती न कराया जाये |
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